अपने काम को पूरे मनोयोग से करना भी एक तरह का योग है। दैनिक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में योग करता है। किसी भी कार्य को ध्यानपूर्वक करना योग है। घर में माँ जब बच्चों के लिए खाना बनाती है तो ध्यान रखती है कि किस प्रकार भोजन को स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाए ताकि बच्चा खाना अच्छे से खाए और उसका शारीरिक विकास पूर्ण रूप से हो,साथ ही वह खाना खाकर तृप्त और प्रसन हो। वह अपने दिमाग को केंद्रित करती है खाना बनाने की प्रक्रिया में।
बच्चे पढ़ाई करते हैं। हम कहते हैं ध्यान दो पढ़ाई पर अर्थात अपना ध्यान केंद्रित करो। .
पिता को ध्यान रहता है घर और बच्चों की जरूरतें पूरी करने का।
हम कोई भी कार्य करें या कुछ भी सीखें ध्यान जरूरी हे जहाँ ध्यान से चूके वहीँ काम बिगड़ा।
आज -कल टीवी पर 'इंडिया गोट टेलेंट ' नाम से कार्यक्रम आ रहा है उसमें जो बच्चे डाँस परफॉर्म कर रहें हैं उनमे ध्यान की अदभुत क्षमता है।
इस प्रकार से जीवन के हेर क्षेत्र में ध्यान व्याप्त है। इसी ध्यान को जब अध्यात्म से जोड़ते हैं अर्थात भौतिक विचारों और वस्तुओं से ध्यान हटा कर एक शून्य पर ध्यान केंद्रित करना ,बाहरी विचारों के आगमन को रोक कर अपने अंतर को ब्रह्माण्ड की सीमाओं के परे तक ले जाना तब हमें ईश्वरीय आनंद की प्राप्ति होती है। वह सुख जिसकी तलाश हम भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति कर महसूस करना चाहते हैं और जीवन भर भटकते रहते हैं।